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क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी

क्षमा करो साथी अब ऐसी,

फिर न कभी रुसवाई होगी 

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी।

नींद स्वयं ही चुरा ले गयी, मेरे मन के स्वप्न सुहाने,

अंधियारी रजनी के धोखे, भूल हो गयी यह अनजाने।

जीवन के चौराहे पर कुछ – मीत मिले थे बिन पहिचाने,

यौवन के आवारापन में, भूल हो गयी यह अनजाने ।   

उनमें से ही कुछ ने आकर, पीर तुम्हें पहुंचाई होगी,

जितनी निकट तुम्हारे, उतनी और कहाँ निठुराई होगी।

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी।।

मिलन–विरह के कोलाहल में, तुम अब तक एकाकी कैसे?

इस परिवर्तनशील जगत में, तुम सचमुच जैसे के तैसे।

कितनी बार क्षमा मांगी और, कितना प्राण–प्रताण किया है,

फिर भी शायद तुमने हमको, नहीं अभी तक क्षमा किया है।

ऐसी निष्ठुर नीति धरा पर, कब किसने अपनायी होगी,

और “आराधना” न इस धरा पर, भक्तों ने अपनायी होगी।

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी।।

यौवन की कुलषित कारा में, तुम पावन से भी अति पावन,

पापी दुनियाँ बहुत बुरी है, ओ मेरे भोले मन भावन।

मेरी पर्णकुटी में आकर तुमने, मुझको कृतार्थ कर दिया,

आजीवन कठोर कारा को कुछ थोड़ा सौहार्द कर दिया।

पर न और अब याद दिलाओ वह अपराध भुलाई होगी ,

देख तुम्हारी निर्मलता को शबनम भी शरमाई होगी।

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी।।


रामवीर सिंह चौहान 
09-12-1974

HINDI POEM HINDI SHAYARI, SAHITYA SANKLAN





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