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Showing posts with the label रामवीर सिंह चौहान

ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा? O mere Durbhagya , Oh my bad luck

  ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा ? बचपन गया शिथिल सा यौवन बीत रही जीवन तरुणाई , काले केश – कुसुम कुम्हलाने आकुल अरुणाई अलसाई ,                         प्रौढ़ पींजरे के बंदी का                         कारावास सफल कब होगा ?                         ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा                         भृकुटि – विलास सरल कब होगा ? सत्कर्मों में रत रह कर भी - हुयी सदा संघर्ष सगाई , सब साधन सम्पन्न सहायक होते हुये पराजय पायी ,             ...

भूले गीत बिसरि गयी कविता

भूले गीत बिसरि गयी कविता  और लेखनी अचल हुयी है। भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है। कल , कोमल कल्पना लोक में आकस्मिक भूचाल आ गया , भावों के गंभीर सिंधु में  असमय भीषण ज्वार आ गया। और किसी की आँख झील सी हँसते – हँसते सजल हुयी है ।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। है स्वीकार मुझे , मैंने ही फणि – मणि साथ निभाना चाहा , अवगुण के कीचड़ में मानवता- का कमल खिलाना चाहा । कलयुग में सतयुग लाने की त्रुटि से पहली पहल हुयी है।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। मानव का अतीत जीवन भर ही , उसका पीछा करता है , कभी किसी अनजान मोड पर बाहों में भींचा करता है। इसी श्रंखला में , अमृत सी साख , किसी की गरल हुयी है। भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। सुमन मिले थे कुछ मनमौजी जो काँटों की चुभन दे गये , आल्हादित और मध्य चन्द्र को चिर स्थायी ग्रहण दे गये। एक सुहानी गुन – गुन करती उजियाली निशि तरल हुयी है।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। अच्छा चलो क्षमा कर भी दो भूल , अज्ञ आवारापन की , या सात्विक श्...

बहुत रो चुके अब मत रोओ।

           बहुत रो चुके अब मत रोओ।                                       बहुत रो चुके अब मत रोओ।                                रोने से आँसू बहते हैं ,                                मन के दुख जग से कहते हैं ,                                जग सुन ले ,                                सुन कर इठलाये ,                ...

अब क्यों कलम चला करती है?

अब क्यों कलम चला करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? पहले भी एकबार चली थी , तब की त्रुटि सुकुमार भली थी। उन-त्रुटि कन्याओं की अब क्यों-  कायाकल्प किया करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? बासन्ती परिचय था जग से , बसुधा प्रथम मिली थी नभ से। क्षितिज-मरीचिकाओं में अब क्यों- व्यर्थ उढ़ान भरा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? त्रेता में सब कुछ संभव था , अवतारों का अद्द्भुत युग था। लंकेशों में कौशलेश अब- क्यों भूमिजा जपा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? तब हमने देखे थे सपने , सपने में अनगिन  थे अपने। इन टूटे सपनों में अब क्यों- खण्डित जगत रचा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? जग अपने द्वंदों में डूबा , कविताओं गीतों से ऊबा। इन ऊबी पीड़ाओं को अब- क्यों वेदना दिया करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? माना जगत मात्र सपना है , क्यों कोई लगता अपना है ? इन सपनों के अपनों को अब- क्यों मन-मीत कहा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? अब तक जो हमसफर मिले हैं , छोड़ मोड पर गये चले  हैं। फिर निति नए बटोही अब क्यों- पथ में साथ लिया लिया करती है ? अब क्यों...

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी  क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी। नींद स्वयं ही चुरा ले गयी , मेरे मन के स्वप्न सुहाने , अंधियारी रजनी के धोखे , भूल हो गयी यह अनजाने। जीवन के चौराहे पर कुछ – मीत मिले थे बिन पहिचाने , यौवन के आवारापन में , भूल हो गयी यह अनजाने ।    उनमें से ही कुछ ने आकर , पीर तुम्हें पहुंचाई होगी , जितनी निकट तुम्हारे , उतनी और कहाँ निठुराई होगी। क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी।। मिलन–विरह के कोलाहल में , तुम अब तक एकाकी कैसे ? इस परिवर्तनशील जगत में , तुम सचमुच जैसे के तैसे। कितनी बार क्षमा मांगी और , कितना प्राण–प्रताण किया है , फिर भी शायद तुमने हमको , नहीं अभी तक क्षमा किया है। ऐसी निष्ठुर नीति धरा पर , कब किसने अपनायी होगी , और “आराधना” न इस धरा पर , भक्तों ने अपनायी होगी। क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी।। यौवन की कुलषित कारा में , तुम पावन से भी अति पावन , पापी दुनियाँ बहुत बुरी है , ओ मेरे भोले मन भावन। मेरी पर्णकुटी में आकर तुमने , मुझको कृतार...

बीते वर्ष बताते जाओ मन की बातें जाते - जाते Beete varsh batate jao man ki baaten jate - jate

बीते बर्ष ! बताते जाओ, मन की बातें जाते - जाते।  बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। कितने मधुर लगे बचपन में ? क्या सपने देखे यौवन में ? पंख थके तब कैसा अनुभव - हुआ सिथिलता आते-आते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। सुमन मुलायम कितने पाये ? तन कितने कल्याण छिपाए ? राव रंक को शांति मिली क्या- नारायण गुण गाते-गाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। जाति-धर्म या वर्ग-भेद की , “हल्ला-बोल” कुरान - वेद की , कैसी लगीं ये परिभाषायें- तुम्हें यहाँ से जाते – जाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। तेरह दिन की अटल कहानी , देव-इंद्र की संयुक्त वानी , सीता राम रिझा पायी क्या- माया काशी जाते – जाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। कितना सुख भोगा जीवन में ? है कैसी चिंता चितवन में ? कितने अपने निकट रहे , और- कितने खोये पाते – पाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। आया कौन बिना आमंत्रण ? किसने ठुकरा दिया निमंत्रण ? कौन समय पर मुकर गया है- झूठी कसमें खाते – खाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जा...