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ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा? O mere Durbhagya , Oh my bad luck

 

ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?

बचपन गया शिथिल सा यौवन
बीत रही जीवन तरुणाई
,
काले केश – कुसुम कुम्हलाने
आकुल अरुणाई अलसाई
,
                        प्रौढ़ पींजरे के बंदी का
                        कारावास सफल कब होगा
?
                        ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
                        भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?
सत्कर्मों में रत रह कर भी -
हुयी सदा संघर्ष सगाई
,
सब साधन सम्पन्न सहायक
होते हुये पराजय पायी
,
                        क्रूर काल के विष वाणों का
                        तीव्र प्रहार शिथिल कब होगा
?
                        ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
                        भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?
दुखी जगत की पीड़ाओं को
गा – गा गीत सुला आया हूँ
,
पर अपनी मंजिल छू – छू कर
मैं हर बार चला आया हूँ
,
                        पागल पन की मदिराओं का
                        यह कटु दौर मृदुल कब होगा
?
                        ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
                        भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?
जिसकी सौम्य सादगी अब तक
मन मोहित सा किए हुये है
,
गुण – गुण की गुंजार सुरीली
भ्रमर गीत सा पिये हुये है
                        उसके मन मानस में विकसित
                        मम अनुराग कमल कब होगा
?
                        ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
                        भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?
शांत प्रकृति की ग्राम्य गोद में
माँ जैसी ममता पायी थी
,
पर लोरी सुनने की आदत
कोलाहल तक ले लायी थी
,
                        सरगम है गमगीन निनादित -
                        नीरव ताज महल कब होगा
?
                        ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
                        भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?
पट उर लाई सोच कर – कर के
विधवा रात्रि बिता पायी थी
,
विद्धुत – दीप बुझा कर
, दिल को-
जला
, भाग्य लिपि पढ़ पायी थी,
                        विधि की वक्र व्यंग्य व्याख्या से
,
                        निर्मल भाग्य – पटल कब होगा
?
                        ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
                        भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?
मन अपने जैसा लेकिन यह -
देह पराई सी लगती है
,
सुभग सादगी में यह कृत्रिम-
रेख
, विंबाई सी दुखती है,
                        चिन्हों का मोहताज विचारा-
                        सचल सुहाग
, अचल कब होगा?
                        ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
                        भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?
मनसा – बाचा मिलन वृन्त को
कर्म
केंद्र क्या बाँध सकेगा ?
पाप किया या पुण्य कमाया
इसका निर्णय राम – रचेगा
,
                        इन अनाम रिश्तों से सहमत
                        सभ्य समाज सकल कब होगा
?
                        ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा
                        भृकुटि – विलास सरल कब होगा
?


रामवीर सिंह चौहान

20-01-1995

sahitya sanklan

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