Skip to main content

Posts

Showing posts with the label हिन्दी कविताएं (Hindi Poems)

ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा? O mere Durbhagya , Oh my bad luck

  ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा ? बचपन गया शिथिल सा यौवन बीत रही जीवन तरुणाई , काले केश – कुसुम कुम्हलाने आकुल अरुणाई अलसाई ,                         प्रौढ़ पींजरे के बंदी का                         कारावास सफल कब होगा ?                         ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा                         भृकुटि – विलास सरल कब होगा ? सत्कर्मों में रत रह कर भी - हुयी सदा संघर्ष सगाई , सब साधन सम्पन्न सहायक होते हुये पराजय पायी ,             ...

पटना में हुयी एक घटना हिन्दी हास्य कविता Hindi funny Poem

दाँतों का सेट एक है बिहार की राजधानी पटना , पटना में हुयी एक घटना। एक बुड्ढा नौजवान , एक बुढ़िया नौजवान। दोनों एक होटल में गये ! वेटर को बुलाया............ दो प्लेट खाना मंगवाया , जब बुड्ढे ने खाना खाया , तो बुढ़िया ने पंखा हिलाया। और जब बुढ़िया ने खाना खाया , तो बुड्ढे ने पंखा हिलाया। यह देख कर ! वहाँ का वेटर चकराया , और चिल्लाया ............ अरे ओ लैला मजनू की औलादों जब इतना ही प्रेम था तो एक साथ क्यूँ नहीं खाया। यह सुन कर बुड्ढा बोला...... अल्लाह के नेक बंदे सवाल तो तेरा नेक है , क्या करूँ हम दोनों के दाँतों का सेट एक है                    प्रशान्त चौहान 

हम आपके बिन

हम आपके बिन  राका पति से रहित रात्रि के सूनेपन से पीड़ित हो , करने लगा कल्पना कल की सजल नयन उन्मीलित हो। अब नहीं रहे हैं सिकन्दरपुर में परमवीर श्री रामवीर , सद्ज्ञानों के ज्ञान पुंज के नहीं विकल्प बचे है और। अब यह तपो भूमि कुछ इस रजनी जैसी होगी , मनु की मानवता पति वंचित सजनी जैसी होगी। एक हूक सी दिल में उठी और कागज पर कलम लगी चलने , उन आशुतोष आराध्य देव की लगी प्रभाती सी पढ़ने। जिनकी सृजन साधना से यह अर्ध – सदी गतिशील रही , जिनकी निर्मल कर्म – कथा संकेतक संगे मील रही । जिनकी निर्मल छत्र  छाँव पा  सिकन्दरपुर छविमान हुआ , जिनकी समता सम्मति से यह पतारा क्षेत्र महान हुआ । जो नव नायक रहे सतघरा कुल के , और समर के कष्ट सहे , जो अपने गाँव सिकन्दरपुर के समाज सुधारक व्यक्ति रहे । जो वर्षों रहे अध्यापक और जिला पंचायत सदस्य रहे , दलीय उपेक्षा और क्षेत्र में भीकम अंक अद्वितीय रहे । दिये अनेकों जल – नल , घर , जिनके कर कमलों ने , जिनके कार्यकाल में पायीं बंदूकें निबलों विकलों ने। जिनकी कृपा कोर से दुर्लभ कवि सम्मेलन सुलभ हुये , जिनके माध्यम से अगणित आमत्य हमारे अतिथि ...

भूले गीत बिसरि गयी कविता

भूले गीत बिसरि गयी कविता  और लेखनी अचल हुयी है। भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है। कल , कोमल कल्पना लोक में आकस्मिक भूचाल आ गया , भावों के गंभीर सिंधु में  असमय भीषण ज्वार आ गया। और किसी की आँख झील सी हँसते – हँसते सजल हुयी है ।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। है स्वीकार मुझे , मैंने ही फणि – मणि साथ निभाना चाहा , अवगुण के कीचड़ में मानवता- का कमल खिलाना चाहा । कलयुग में सतयुग लाने की त्रुटि से पहली पहल हुयी है।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। मानव का अतीत जीवन भर ही , उसका पीछा करता है , कभी किसी अनजान मोड पर बाहों में भींचा करता है। इसी श्रंखला में , अमृत सी साख , किसी की गरल हुयी है। भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। सुमन मिले थे कुछ मनमौजी जो काँटों की चुभन दे गये , आल्हादित और मध्य चन्द्र को चिर स्थायी ग्रहण दे गये। एक सुहानी गुन – गुन करती उजियाली निशि तरल हुयी है।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। अच्छा चलो क्षमा कर भी दो भूल , अज्ञ आवारापन की , या सात्विक श्...

बहुत रो चुके अब मत रोओ।

           बहुत रो चुके अब मत रोओ।                                       बहुत रो चुके अब मत रोओ।                                रोने से आँसू बहते हैं ,                                मन के दुख जग से कहते हैं ,                                जग सुन ले ,                                सुन कर इठलाये ,                ...

अब क्यों कलम चला करती है?

अब क्यों कलम चला करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? पहले भी एकबार चली थी , तब की त्रुटि सुकुमार भली थी। उन-त्रुटि कन्याओं की अब क्यों-  कायाकल्प किया करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? बासन्ती परिचय था जग से , बसुधा प्रथम मिली थी नभ से। क्षितिज-मरीचिकाओं में अब क्यों- व्यर्थ उढ़ान भरा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? त्रेता में सब कुछ संभव था , अवतारों का अद्द्भुत युग था। लंकेशों में कौशलेश अब- क्यों भूमिजा जपा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? तब हमने देखे थे सपने , सपने में अनगिन  थे अपने। इन टूटे सपनों में अब क्यों- खण्डित जगत रचा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? जग अपने द्वंदों में डूबा , कविताओं गीतों से ऊबा। इन ऊबी पीड़ाओं को अब- क्यों वेदना दिया करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? माना जगत मात्र सपना है , क्यों कोई लगता अपना है ? इन सपनों के अपनों को अब- क्यों मन-मीत कहा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? अब तक जो हमसफर मिले हैं , छोड़ मोड पर गये चले  हैं। फिर निति नए बटोही अब क्यों- पथ में साथ लिया लिया करती है ? अब क्यों...

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी  क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी। नींद स्वयं ही चुरा ले गयी , मेरे मन के स्वप्न सुहाने , अंधियारी रजनी के धोखे , भूल हो गयी यह अनजाने। जीवन के चौराहे पर कुछ – मीत मिले थे बिन पहिचाने , यौवन के आवारापन में , भूल हो गयी यह अनजाने ।    उनमें से ही कुछ ने आकर , पीर तुम्हें पहुंचाई होगी , जितनी निकट तुम्हारे , उतनी और कहाँ निठुराई होगी। क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी।। मिलन–विरह के कोलाहल में , तुम अब तक एकाकी कैसे ? इस परिवर्तनशील जगत में , तुम सचमुच जैसे के तैसे। कितनी बार क्षमा मांगी और , कितना प्राण–प्रताण किया है , फिर भी शायद तुमने हमको , नहीं अभी तक क्षमा किया है। ऐसी निष्ठुर नीति धरा पर , कब किसने अपनायी होगी , और “आराधना” न इस धरा पर , भक्तों ने अपनायी होगी। क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी।। यौवन की कुलषित कारा में , तुम पावन से भी अति पावन , पापी दुनियाँ बहुत बुरी है , ओ मेरे भोले मन भावन। मेरी पर्णकुटी में आकर तुमने , मुझको कृतार...

बीते वर्ष बताते जाओ मन की बातें जाते - जाते Beete varsh batate jao man ki baaten jate - jate

बीते बर्ष ! बताते जाओ, मन की बातें जाते - जाते।  बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। कितने मधुर लगे बचपन में ? क्या सपने देखे यौवन में ? पंख थके तब कैसा अनुभव - हुआ सिथिलता आते-आते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। सुमन मुलायम कितने पाये ? तन कितने कल्याण छिपाए ? राव रंक को शांति मिली क्या- नारायण गुण गाते-गाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। जाति-धर्म या वर्ग-भेद की , “हल्ला-बोल” कुरान - वेद की , कैसी लगीं ये परिभाषायें- तुम्हें यहाँ से जाते – जाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। तेरह दिन की अटल कहानी , देव-इंद्र की संयुक्त वानी , सीता राम रिझा पायी क्या- माया काशी जाते – जाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। कितना सुख भोगा जीवन में ? है कैसी चिंता चितवन में ? कितने अपने निकट रहे , और- कितने खोये पाते – पाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। आया कौन बिना आमंत्रण ? किसने ठुकरा दिया निमंत्रण ? कौन समय पर मुकर गया है- झूठी कसमें खाते – खाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जा...