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माँ हिन्दी कविता Maa Hindi Poem

माँ                    माँ                    दिल के टुकड़े करने वाला , दिल का टुकड़ा लगता है , नालायक बेटा भी माँ को , राजा बेटा लगता  है। माँ की ममता जैसा निर्मल , कोई दर्पण क्या होगा , जिसको धूल सना बच्चा भी , सूरज चंदा लगता है। पूछो तो नन्हें पछी से , जब धमकता है मौसम ,  माँ के पंखों मे छिप जाना , कितना अच्छा लगता है। जिसके चरणों में ज्ञानीजन , तीनों लोक बताते  हैं , मुझको माँ के चरणों में , जग सिमटा-सिमटा लगता है। चुंबन अंकित करती है जब , सिर पर हांथ फिरा कर माँ , अम्बर से ऊँचा मुझको , तब अपना माथा लगता है। गंगा जल की पावनता की , माना महिमा भारी  है , लेकिन “माँ” के आँसू से , वो मुझको हल्का लगता है। दुख से राहत पाने को , यूँ  तो लाखों रस्ते हैं , माँ की यादों में खो जाना , सीधा रस्ता लगता  है।   माँ की गोद अगर मिल जाये , सारी दुनियाँ देकर भी , महँगे युग से भी मुझको , यह सस्ता सौदा लगता है। दिल के टुकड़े करने वाला , दिल का टुकड़ा लगता ह...