माँ माँ दिल के टुकड़े करने वाला , दिल का टुकड़ा लगता है , नालायक बेटा भी माँ को , राजा बेटा लगता है। माँ की ममता जैसा निर्मल , कोई दर्पण क्या होगा , जिसको धूल सना बच्चा भी , सूरज चंदा लगता है। पूछो तो नन्हें पछी से , जब धमकता है मौसम , माँ के पंखों मे छिप जाना , कितना अच्छा लगता है। जिसके चरणों में ज्ञानीजन , तीनों लोक बताते हैं , मुझको माँ के चरणों में , जग सिमटा-सिमटा लगता है। चुंबन अंकित करती है जब , सिर पर हांथ फिरा कर माँ , अम्बर से ऊँचा मुझको , तब अपना माथा लगता है। गंगा जल की पावनता की , माना महिमा भारी है , लेकिन “माँ” के आँसू से , वो मुझको हल्का लगता है। दुख से राहत पाने को , यूँ तो लाखों रस्ते हैं , माँ की यादों में खो जाना , सीधा रस्ता लगता है। माँ की गोद अगर मिल जाये , सारी दुनियाँ देकर भी , महँगे युग से भी मुझको , यह सस्ता सौदा लगता है। दिल के टुकड़े करने वाला , दिल का टुकड़ा लगता ह...
हिन्दी कवितायें, रचनाएँ , जीवन परिचय, मुंशीप्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त