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Showing posts with the label प्रशान्त चौहान की रचनाएँ

पटना में हुयी एक घटना हिन्दी हास्य कविता Hindi funny Poem

दाँतों का सेट एक है बिहार की राजधानी पटना , पटना में हुयी एक घटना। एक बुड्ढा नौजवान , एक बुढ़िया नौजवान। दोनों एक होटल में गये ! वेटर को बुलाया............ दो प्लेट खाना मंगवाया , जब बुड्ढे ने खाना खाया , तो बुढ़िया ने पंखा हिलाया। और जब बुढ़िया ने खाना खाया , तो बुड्ढे ने पंखा हिलाया। यह देख कर ! वहाँ का वेटर चकराया , और चिल्लाया ............ अरे ओ लैला मजनू की औलादों जब इतना ही प्रेम था तो एक साथ क्यूँ नहीं खाया। यह सुन कर बुड्ढा बोला...... अल्लाह के नेक बंदे सवाल तो तेरा नेक है , क्या करूँ हम दोनों के दाँतों का सेट एक है                    प्रशान्त चौहान 

हम आपके बिन

हम आपके बिन  राका पति से रहित रात्रि के सूनेपन से पीड़ित हो , करने लगा कल्पना कल की सजल नयन उन्मीलित हो। अब नहीं रहे हैं सिकन्दरपुर में परमवीर श्री रामवीर , सद्ज्ञानों के ज्ञान पुंज के नहीं विकल्प बचे है और। अब यह तपो भूमि कुछ इस रजनी जैसी होगी , मनु की मानवता पति वंचित सजनी जैसी होगी। एक हूक सी दिल में उठी और कागज पर कलम लगी चलने , उन आशुतोष आराध्य देव की लगी प्रभाती सी पढ़ने। जिनकी सृजन साधना से यह अर्ध – सदी गतिशील रही , जिनकी निर्मल कर्म – कथा संकेतक संगे मील रही । जिनकी निर्मल छत्र  छाँव पा  सिकन्दरपुर छविमान हुआ , जिनकी समता सम्मति से यह पतारा क्षेत्र महान हुआ । जो नव नायक रहे सतघरा कुल के , और समर के कष्ट सहे , जो अपने गाँव सिकन्दरपुर के समाज सुधारक व्यक्ति रहे । जो वर्षों रहे अध्यापक और जिला पंचायत सदस्य रहे , दलीय उपेक्षा और क्षेत्र में भीकम अंक अद्वितीय रहे । दिये अनेकों जल – नल , घर , जिनके कर कमलों ने , जिनके कार्यकाल में पायीं बंदूकें निबलों विकलों ने। जिनकी कृपा कोर से दुर्लभ कवि सम्मेलन सुलभ हुये , जिनके माध्यम से अगणित आमत्य हमारे अतिथि ...

अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का Hindi Poem Achha chalo prayas karenge apne me seemit rahne ka

अच्छा चलो प्रयास करेंगे  अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। धरती भी तो अपनी कीली पर जाने कब से घूम रही है , और न जाने कब से अपने सूर्य देव पर रीझ रही है। अब हम भी अभ्यास करेंगे , अविरल ऐसी गति सहने का , अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। अम्बर भी अपनी ऊंचाई- पर ही सदा तना रहता है , और वहीं से चाँद- सितारों- का उगना-छुपना रहता है। अब हम भी एहसास करेंगे , नभ जैसे उन्नत रहने का , अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। सागर भी अपनी गहराई- में ही मिलन गीत गाता है , और इसी गंभीर प्रकृति से शृष्टि-प्रलय भी सह जाता है। हम अद्भुत आभास करेंगे , शोक-सिंधु संचित करने का , अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। मेरे अभिमानी अग्रज तुम- कैसे निष्ठुर हो जाते हो ? ज्ञान-भक्ति के संवादों से अहंकार में खो जाते हो। आओ बुद्धि- विकास करेंगे , क्रोध-समय संयत रहने का , अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। शीत लहर सी याद तुम्हारी तन , मन तक सिहरा जाती है , मुस्कानों के महानगर से  गम का गाँव कंपा जाती है। पर हम व्रत- उपवास ...

किसी अजाने गाँव में आओ हम तुम हो आयें हिन्दी कविता Hindi poems

आओ हम तुम हो आयें  दूर नगर के कोलाहल से   किसी   अजाने   गाँव   में   सुख सपनों की छांव में आओ हम तुम हो आयें।                                जहां सदा उन्मुक्त विहग दल                              भोर   उगाता   है   गा - गा कर                              कली- कली   के द्वारे   मधुकर                              प्यार   जताता   है   जा-जा कर। जहां तरुणियो...

आँखें मेरी नम रहतीं हैं

     आँखें मेरी नम रहतीं हैं    हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं   हैं अपने पास बुलाने को तेरा   रस्ता   तकती रहतीं हैं बस कुछ ही दिन हुये अभी हैं हमको साथ में चलते – चलते सफर   बहुत   लंबा   है   साथी दूर न जाना मुझसे झगड़ के रूठ के मुझसे खफा न होना , ये सांसें तुमसे चलती हैं हे   स्नेहा तुमसे   विछुड़   कर आँखें   मेरी नम रहतीं   हैं मेरी आदत है कुछ ऐसी जो तुमको दुख पहुँचाती है और विवश होकर फिर तुम मुझको दस-बीस सुनाती हो हे प्रिया तुम्हारे वचनों को सुन , दिल की धड़कन रुक-रुक चलती है हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं   हैं मेरे जीवन की साथी होकर क्या तुम मुझको समझ न पायी चीर के देखो सीना मेरा उसमे हो बस तुम्ही समायी सुबह- शाम ले नाम तुम्हारा , मेरी दिनचर्या चलती है हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं   हैं कभी-कभी तो प्यार ही मेरा क्रोध का कारण बनता है पर सदियों से पति-पत्नी में अन-मन यूं चलता रहता है भले रात हो म...