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| माँ |
माँ
दिल के टुकड़े करने वाला, दिल का टुकड़ा लगता है,
नालायक बेटा भी माँ को, राजा बेटा लगता है।
माँ की ममता जैसा निर्मल, कोई दर्पण क्या होगा,
जिसको धूल सना बच्चा भी, सूरज चंदा लगता है।
पूछो तो नन्हें पछी से, जब धमकता है मौसम,
माँ
के पंखों मे छिप जाना, कितना अच्छा लगता है।
जिसके चरणों में ज्ञानीजन, तीनों लोक बताते हैं,
मुझको माँ के चरणों में, जग सिमटा-सिमटा लगता है।
चुंबन अंकित करती है जब, सिर पर हांथ फिरा कर माँ,
अम्बर से ऊँचा मुझको, तब अपना माथा लगता है।
गंगा जल की पावनता की, माना महिमा भारी है,
लेकिन “माँ” के आँसू से, वो मुझको हल्का लगता है।
दुख से राहत पाने को, यूँ तो लाखों रस्ते हैं,
माँ की यादों में खो जाना, सीधा रस्ता लगता है।
माँ की गोद अगर मिल जाये, सारी दुनियाँ देकर भी,
महँगे युग से भी मुझको, यह सस्ता सौदा लगता है।
दिल के टुकड़े करने वाला, दिल का टुकड़ा लगता है,
नालायक बेटा भी माँ को, राजा बेटा लगता है।
कल्पना चौहान

Superb..maza aagya
ReplyDeleteBeautiful poem.👌🏼
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