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उपन्यास

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क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी  क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी। नींद स्वयं ही चुरा ले गयी , मेरे मन के स्वप्न सुहाने , अंधियारी रजनी के धोखे , भूल हो गयी यह अनजाने। जीवन के चौराहे पर कुछ – मीत मिले थे बिन पहिचाने , यौवन के आवारापन में , भूल हो गयी यह अनजाने ।    उनमें से ही कुछ ने आकर , पीर तुम्हें पहुंचाई होगी , जितनी निकट तुम्हारे , उतनी और कहाँ निठुराई होगी। क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी।। मिलन–विरह के कोलाहल में , तुम अब तक एकाकी कैसे ? इस परिवर्तनशील जगत में , तुम सचमुच जैसे के तैसे। कितनी बार क्षमा मांगी और , कितना प्राण–प्रताण किया है , फिर भी शायद तुमने हमको , नहीं अभी तक क्षमा किया है। ऐसी निष्ठुर नीति धरा पर , कब किसने अपनायी होगी , और “आराधना” न इस धरा पर , भक्तों ने अपनायी होगी। क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी।। यौवन की कुलषित कारा में , तुम पावन से भी अति पावन , पापी दुनियाँ बहुत बुरी है , ओ मेरे भोले मन भावन। मेरी पर्णकुटी में आकर तुमने , मुझको कृतार...

बीते वर्ष बताते जाओ मन की बातें जाते - जाते Beete varsh batate jao man ki baaten jate - jate

बीते बर्ष ! बताते जाओ, मन की बातें जाते - जाते।  बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। कितने मधुर लगे बचपन में ? क्या सपने देखे यौवन में ? पंख थके तब कैसा अनुभव - हुआ सिथिलता आते-आते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। सुमन मुलायम कितने पाये ? तन कितने कल्याण छिपाए ? राव रंक को शांति मिली क्या- नारायण गुण गाते-गाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। जाति-धर्म या वर्ग-भेद की , “हल्ला-बोल” कुरान - वेद की , कैसी लगीं ये परिभाषायें- तुम्हें यहाँ से जाते – जाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। तेरह दिन की अटल कहानी , देव-इंद्र की संयुक्त वानी , सीता राम रिझा पायी क्या- माया काशी जाते – जाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। कितना सुख भोगा जीवन में ? है कैसी चिंता चितवन में ? कितने अपने निकट रहे , और- कितने खोये पाते – पाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। आया कौन बिना आमंत्रण ? किसने ठुकरा दिया निमंत्रण ? कौन समय पर मुकर गया है- झूठी कसमें खाते – खाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जा...

ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा? O mere Durbhagya , Oh my bad luck

  ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा ? बचपन गया शिथिल सा यौवन बीत रही जीवन तरुणाई , काले केश – कुसुम कुम्हलाने आकुल अरुणाई अलसाई ,                         प्रौढ़ पींजरे के बंदी का                         कारावास सफल कब होगा ?                         ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा                         भृकुटि – विलास सरल कब होगा ? सत्कर्मों में रत रह कर भी - हुयी सदा संघर्ष सगाई , सब साधन सम्पन्न सहायक होते हुये पराजय पायी ,             ...