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आँखें मेरी नम रहतीं हैं

 

   आँखें मेरी नम रहतीं हैं   


हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं  हैं

अपने पास बुलाने को तेरा  रस्ता  तकती रहतीं हैं

बस कुछ ही दिन हुये अभी हैं

हमको साथ में चलते –चलते

सफर  बहुत  लंबा  है  साथी

दूर न जाना मुझसे झगड़ के

रूठ के मुझसे खफा न होना, ये सांसें तुमसे चलती हैं

हे  स्नेहा तुमसे  विछुड़  कर आँखें  मेरी नम रहतीं  हैं

मेरी आदत है कुछ ऐसी

जो तुमको दुख पहुँचाती है

और विवश होकर फिर तुम

मुझको दस-बीस सुनाती हो

हे प्रिया तुम्हारे वचनों को सुन, दिल की धड़कन रुक-रुक चलती है

हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं  हैं

मेरे जीवन की साथी होकर

क्या तुम मुझको समझ न पायी

चीर के देखो सीना मेरा

उसमे हो बस तुम्ही समायी

सुबह- शाम ले नाम तुम्हारा, मेरी दिनचर्या चलती है

हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं  हैं

कभी-कभी तो प्यार ही मेरा

क्रोध का कारण बनता है

पर सदियों से पति-पत्नी में

अन-मन यूं चलता रहता है

भले रात हो मावस की, मेरी रातों में “पूनम” रहती है

हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं  हैं


क्षत्रिय प्रशान्त चौहान 

06/02/2016


HINDI POEMS HINDI SHAYARI  SAHITYA SANKLAN


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