बहुत रो चुके अब मत रोओ।
बहुत रो चुके अब मत रोओ।
रोने से आँसू बहते हैं,
मन के दुख जग से कहते हैं,
जग सुन ले,
सुन कर इठलाये,
हँसे, और चाहे, फिर रोओ।
बहुत रो चुके अब मत रोओ।
जितना जग न जमा कर पाया,
उतना तुमने व्यर्थ लुटाया,
फिर भी तुम्हें-
कृपण समझे,
ऐसे जग पर मत नयन भिगोओ।
बहुत रो चुके अब मत रोओ।।
मुझको ही देखो मैं क्या हूँ?
महा सृष्टि में लघु तृण सा हूँ,
फिर भी जग-
जलता है, तुम तो-
रूप धनी मोती मत खोओ।
बहुत रो चुके अब मत रोओ।।
तुमने भी जग से क्या पाया?
सुख की छाया, दुख की माया,
देखो इस-
छाया-माया को,
फिर मत मिथ्या स्वप्न सँजोओ।
बहुत रो चुके अब मत रोओ।।
कल ही देखो क्या कुयोग था?
संध्या-दिवस मिलन सुयोग था,
इस आकस्मिक,
मधुर मिलन पर,
भ्रमितों से भयभीत न होओ।
बहुत रो चुके अब मत रोओ।।
समझो, फिर कवि के-
गीतों में संगीत पिरोओ।
(01-12-1994)

👌🏼👌🏼nice
ReplyDeleteThank u
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