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भूले गीत बिसरि गयी कविता

भूले गीत बिसरि गयी कविता 

और लेखनी अचल हुयी है।

भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।

कल, कोमल कल्पना लोक में
आकस्मिक भूचाल आ गया,
भावों के गंभीर सिंधु में 
असमय भीषण ज्वार आ गया।

और किसी की आँख झील सी हँसते – हँसते सजल हुयी है । 
भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।।

है स्वीकार मुझे, मैंने ही
फणि – मणि साथ निभाना चाहा,
अवगुण के कीचड़ में मानवता-
का कमल खिलाना चाहा ।

कलयुग में सतयुग लाने की त्रुटि से पहली पहल हुयी है। 
भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।।

मानव का अतीत जीवन भर
ही, उसका पीछा करता है,
कभी किसी अनजान मोड पर
बाहों में भींचा करता है।

इसी श्रंखला में, अमृत सी साख, किसी की गरल हुयी है।
भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।।

सुमन मिले थे कुछ मनमौजी
जो काँटों की चुभन दे गये,
आल्हादित और मध्य चन्द्र को
चिर स्थायी ग्रहण दे गये।

एक सुहानी गुन – गुन करती उजियाली निशि तरल हुयी है। 
भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।।

अच्छा चलो क्षमा कर भी दो
भूल, अज्ञ आवारापन की,
या सात्विक श्रद्धा ठुकरा दो
दे उपाधि तुम पागलपन की।

मैं समझूँगा – चलो आज से रेख भाग्य की विरल हुयी है। 
भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।।

भला बुरा जैसा भी हूँ मैं
तुमको नहीं सता पाऊँगा,
मेरी चलने की आदत है
चाहे जहाँ चला जाऊँगा।

पर दुख है अकलंक देवता की अंकित छवि सचल हुयी है। 
भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।।



रामवीर सिंह चौहान 
(14-01-1994)


Bhoole geet , sahitya sanklan




Comments

  1. Mujhe To Apne Mama Ji Ki ki Sabhi e kavitaen bahut acchi lagi hai🙏🙏

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