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मैं तो था लाचार, प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया main to tha laachaar, pyaar ne tumako kyon majaboor kar diya बलबीर सिंह रंग

 "मैं" तो था लाचार

“मैं” तो था लाचार,

प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?

देखा   चारो   ओर   तुम्हारे

वरदानों  की  भीड़  खड़ी है,

अभिशापित सुहाग की बिंदी

विधि  ने  मेरे  भाल  जड़ी है।

पाप किया या पुण्य कमाया

इसका निर्णय कौन  करेगा,

क्योंकि यहाँ की हर परिभाषा

लाखों बार  बनी  बिगड़ी है।

पाप पुण्य के सिरजन हारो

मेरा  दुर्लभ   दान   निहारो,

खाली हांथों रहकर जो कुछ

जिसे दिया भरपूर कर दिया।

“मैं” तो था लाचार,

प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?

दो दिन खेल गँवाया बचपन

रातों   में   काटी   तरुणायी,

लिखी आंसुओं  ने  जो पाती

वह मुसकानों तक पहुंचायी।

मैं   दुर्बलताओं    का  बंदी

पर   मेरी  हिम्मत  तो देखो,

गीतों का परिधान पहन कर

सूली  ऊपर  सेज  सजायी।

लोक  लाज  के  पहरे दारो

आओ  अपनी  भूल सुधारो,

इतना  पास  नहीं पहुँचा था

जितना तुमने दूर कर दिया।

“मैं” तो था लाचार,

प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?

पग धरने  का  ठौर नहीं है

धूनी किसके  द्वार रमाऊँ?

मेरी  चलने  की  आदत है

कौन नगर की डगर न जाऊँ?

कहने  को  तो मीत बहुत हैं

किससे रूठूँ किसे मनाऊँ?

किसकी  सुन्दरता पर रीझूँ

किसे असुंदर कह ठुकराऊँ?

रूप-गगन के चाँद-सितारो

तुम  मेरी   आरती   उतारो,

अपने अति-सुन्दर सपनों का

दर्पण चकना चूर कर दिया।

“मैं” तो था लाचार,

प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?

 

बलबीर सिंह ( रंग जी )

( गंध रचती छंद  )


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