जयशंकर प्रसाद
जन्म - सन् 1889 ई.
निधन-
सन् 1936 ई.
जन्म स्थान
– काशी (सूँघनी
साहू परिवार में)
माता-
मुन्नी देवी
पिता-
बाबू देवी प्रसाद
गुरू
– ‘दीनबन्धु ब्रह्मचारी’ प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन के लिए शिक्षक थी।
प्रसाद को बचपन में झारखण्डी नाम से पुकारा जाता था।
कलाधार नाम से ब्रजभाषा में काव्य रचना करते थे।
इनके परिवार की गणना वाराणसी के समृद्ध
परिवारों में होती थी।
प्रसाद का परिवार शिव का उपासक था।
जीवन परिचय
प्रसाद जी का जन्म माघ शुक्ल 10, संवत् 1946 वि० (तदनुसार 30जनवरी 1889ई० दिन-गुरुवार) को काशी के सरायगोवर्धन में हुआ। इनके पितामह बाबू शिवरतन साहू दान देने में प्रसिद्ध थे और एक विशेष प्रकार की सुरती (तम्बाकू) बनाने के कारण 'सुँघनी साहु' के नाम से विख्यात थे। इनके पिता बाबू देवीप्रसाद जी कलाकारों का आदर करने के लिये विख्यात थे। इनका काशी में बड़ा सम्मान था और काशी की जनता काशीनरेश के बाद 'हर हर महादेव' से बाबू देवीप्रसाद का ही स्वागत करती थी। किशोरावस्था के पूर्व ही माता और बड़े भाई का देहावसान हो जाने के कारण 17 वर्ष की उम्र में ही प्रसाद जी पर आपदाओं का पहाड़ ही टूट पड़ा।इनकी 12 वर्ष की आयु में इनके पिता का और 15 वर्ष की आयु में बङे भाई शंभुरतन का देहांत हो गया था।
प्रसाद तरूणाई में ही माता-पिता, बङे भाई, दो पत्नियों और इकलौते पुत्र की वियोग व्यथा झेल चुके थे । कच्ची गृहस्थी, घर में सहारे के रूप में केवल विधवा भाभी, कुटुबिंयों, परिवार से संबद्ध अन्य लोगों का संपत्ति हड़पने
का षड्यंत्र, इन सबका सामना उन्होंने धीरता और गंभीरता के साथ
किया। प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी में क्वींस कालेज में हुई, किंतु बाद में घर पर इनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया, जहाँ संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन इन्होंने किया। दीनबंधु ब्रह्मचारी जैसे विद्वान् इनके संस्कृत के अध्यापक थे। इनके
गुरुओं में 'रसमय सिद्ध' की भी चर्चा
की जाती है।
घर के वातावरण के कारण साहित्य और कला के प्रति उनमें प्रारंभ से ही रुचि थी और कहा जाता है कि नौ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने 'कलाधर' के नाम से व्रजभाषा में एक सवैया लिखकर 'रसमय सिद्ध' को दिखाया था। उन्होंने वेद, इतिहास, पुराण तथा साहित्य शास्त्र का अत्यंत गंभीर अध्ययन किया था। वे बाग-बगीचे तथा भोजन बनाने के शौकीन थे और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। वे नियमित व्यायाम करनेवाले, सात्विक खान पान एवं गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। वे नागरीप्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष भी थे।
प्रसाद जी का जीवन कुल 48 वर्ष का रहा है। जयशंकर प्रसाद जी का देहान्त 15 नवम्बर, सन् 1937 ई. में हो गया इसी में उनकी रचना प्रक्रिया इसी विभिन्न साहित्यिक विधाओं में प्रतिफलित हुई कि कभी-कभी आश्चर्य होता है। कविता, उपन्यास, नाटक और निबन्ध सभी में उनकी गति समान है। किन्तु अपनी हर विद्या में उनका कविसर्वत्र मुखरित है। वस्तुतः एक कवि की गहरी कल्पनाशीलता ने ही साहित्य को अन्य विधाओं में उन्हें विशिष्ट और व्यक्तिगत प्रयोग करने के लिये अनुप्रेरित किया। उनकी कहानियों का अपना पृथक् और सर्वथा मौलिक शिल्पहै, उनके चरित्र-चित्रण का, भाषा-सौष्ठव का, वाक्यगठन का एक सर्वथा निजी प्रतिष्ठान है। उनके नाटकों में भी इसी प्रकार के अभिनव और श्लाघ्य प्रयोग मिलते हैं। प्रसाद जी भारत के उन्नत अतीत का जीवित वातावरण प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त थे। उनकी कितनी ही कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें आदि से अंत तक भारतीय संस्कृति एवं आदर्शो की रक्षा का सफल प्रयास किया गया है। और ‘आँसू’ ने उनके हृदय की उस पीड़ा को शब्द दिए जो उनके जीवन में अचानक मेहमान बनकर आई और हिन्दी भाषा को समृद्ध कर गई।
प्रमुख काव्य संग्रह-
द्विवेदी युगीन ब्रजभाषा में रचित काव्य
संग्रह-
उर्वशी (1909 ई.)
वनमिलन
(1909 ई.)
प्रेम राज्य
(1909 ई.)
अयोध्या का उद्धार (1910 ई.)
शोकोछच्बास
(1910 ई.)
वभ्रुवाहन
(1911 ई.)
कहानी संग्रह
कुल
69 कहानियाँ लिखी जो पांच संग्रहों में संकलित है-
छाया (1912 ई.)
प्रतिध्वनि
(1926 ई.)
आकाशदीप
(1929 ई.)
आंधी
(1931 ई.)
इन्द्रजाल
(1936 ई.)
प्रमुख कहानियाँ
पुरस्कार
देवरथ
ममता
सालवती
बेङी
गुण्डा
नीरा
मधुवा
गुण्डा
छोटा जादूगर
उपन्यास
कंकाल
(1929 ई.)
तितली
(1934 ई.)
इरावती
(अपूर्ण)
नाटकों का प्रारंभ
जयशंकर प्रसाद हिन्दी कवि, नाटककार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिन्दी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में न केवल कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई और कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया। बाद के प्रगतिशील एवं नई कविता दोनों धाराओं के प्रमुख आलोचकों ने उसकी इस शक्तिमत्ता को स्वीकृति दी। इसका एक अतिरिक्त प्रभाव यह भी हुआ कि खड़ीबोली हिन्दी काव्य की निर्विवाद सिद्ध भाषा बन गयी।
कला पक्ष
'प्रसाद' के काव्य का कलापक्ष भी पूर्ण सशक्त और
संतुलित है। उनकी भाषा, शैली, अलंकरण,
छन्द-योजना, सभी कुछ एक महाकवि के स्तरानुकूल हैं।
भाषा
प्रसाद जी की भाषा के कई रूप उनके काव्य
की विकास यात्रा में दिखाई पड़ते हैं। आपने आरम्भ ब्रजभाषा से किया और फिर खड़ीबोली
को अपनाकर उसे परिष्कृत, प्रवाहमयी, संस्कृतनिष्ठ भाषा के रूप में अपनी काव्य
भाषा बना लिया। प्रसाद जी का शब्द चयन ध्वन्यात्मक सौन्दर्य से भी समन्वित है; यथा-
खग कुल कुल कुल-सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा।
प्रसाद जी ने लाक्षणिक शब्दावली के प्रयोग
द्वारा अपनी रचनाओं में मार्मिक सौन्दर्य की सृष्टि की है।
शैली
प्रसाद जी की काव्य शैली में परम्परागत
तथा नव्य अभिव्यक्ति कौशल का सुन्दर समन्वय है। उसमें ओज,
माधुर्य और प्रसाद-तीनों गुणों की सुसंगति है। विषय और भाव के अनुकूल विविध शैलियों
का प्रौढ़ प्रयोग उनके काव्य में प्राप्त होता है। वर्णनात्मक, भावात्मक,
आलंकारिक, सूक्तिपरक, प्रतीकात्मक आदि शैली-रूप उनकी अभिव्यक्ति को पूर्णता प्रदान
करते हैं। वर्णनात्मक शैली में शब्द चित्रांकन की कुशलता दर्शनीय होती है।
अलंकरण
प्रसाद जी की दृष्टि साम्यमूलक अलंकारों
पर ही रही है। शब्दालंकार अनायास ही आए हैं। रूपक,
रूपकातिशयोक्ति, उपमा, उत्प्रेक्षा,
प्रतीक आदि आपके प्रिय अलंकार हैं।

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