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ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा? O mere Durbhagya , Oh my bad luck

  ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा भृकुटि – विलास सरल कब होगा ? बचपन गया शिथिल सा यौवन बीत रही जीवन तरुणाई , काले केश – कुसुम कुम्हलाने आकुल अरुणाई अलसाई ,                         प्रौढ़ पींजरे के बंदी का                         कारावास सफल कब होगा ?                         ओ मेरे दुर्भाग्य ! तुम्हारा                         भृकुटि – विलास सरल कब होगा ? सत्कर्मों में रत रह कर भी - हुयी सदा संघर्ष सगाई , सब साधन सम्पन्न सहायक होते हुये पराजय पायी ,             ...

जयशंकर प्रसाद जीवन परिचय

  जयशंकर प्रसाद जन्म -  सन् 1889 ई . निधन - सन् 1936 ई . जन्म स्थान – काशी ( सूँघनी साहू परिवार में ) माता - मुन्नी देवी पिता - बाबू देवी प्रसाद गुरू – ‘ दीनबन्धु ब्रह्मचारी ’ प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन के लिए शिक्षक थी। प्रसाद को बचपन में  झारखण्डी नाम से पुकारा जाता था। कलाधार  नाम से ब्रजभाषा में काव्य रचना करते थे। इनके परिवार की गणना वाराणसी के समृद्ध परिवारों में होती थी। प्रसाद का परिवार शिव का उपासक था। जीवन परिचय प्रसाद जी का जन्म माघ शुक्ल 10, संवत् ‌ 1946 वि० ( तदनुसार 30 जनवरी 1889 ई० दिन - गुरुवार ) को काशी के सरायगोवर्धन में हुआ। इनके पितामह बाबू शिवरतन साहू दान देने में प्रसिद्ध थे और एक विशेष प्रकार की सुरती ( तम्बाकू ) बनाने के कारण ' सुँघनी साहु ' के नाम से विख्यात थे। इनके पिता बाबू देवीप्रसाद जी कलाकारों का आदर करने के लिये विख्यात थे। इनका काशी में बड़ा सम्मान था और काशी की जनता काशीनरेश के बाद ' हर हर महादेव ' से बाबू देवीप्रसाद का ही स्वागत करती थी। किशोरावस्था के पूर्व ही माता और बड़े भाई का देहावसान हो जाने के...

पटना में हुयी एक घटना हिन्दी हास्य कविता Hindi funny Poem

दाँतों का सेट एक है बिहार की राजधानी पटना , पटना में हुयी एक घटना। एक बुड्ढा नौजवान , एक बुढ़िया नौजवान। दोनों एक होटल में गये ! वेटर को बुलाया............ दो प्लेट खाना मंगवाया , जब बुड्ढे ने खाना खाया , तो बुढ़िया ने पंखा हिलाया। और जब बुढ़िया ने खाना खाया , तो बुड्ढे ने पंखा हिलाया। यह देख कर ! वहाँ का वेटर चकराया , और चिल्लाया ............ अरे ओ लैला मजनू की औलादों जब इतना ही प्रेम था तो एक साथ क्यूँ नहीं खाया। यह सुन कर बुड्ढा बोला...... अल्लाह के नेक बंदे सवाल तो तेरा नेक है , क्या करूँ हम दोनों के दाँतों का सेट एक है                    प्रशान्त चौहान 

हम आपके बिन

हम आपके बिन  राका पति से रहित रात्रि के सूनेपन से पीड़ित हो , करने लगा कल्पना कल की सजल नयन उन्मीलित हो। अब नहीं रहे हैं सिकन्दरपुर में परमवीर श्री रामवीर , सद्ज्ञानों के ज्ञान पुंज के नहीं विकल्प बचे है और। अब यह तपो भूमि कुछ इस रजनी जैसी होगी , मनु की मानवता पति वंचित सजनी जैसी होगी। एक हूक सी दिल में उठी और कागज पर कलम लगी चलने , उन आशुतोष आराध्य देव की लगी प्रभाती सी पढ़ने। जिनकी सृजन साधना से यह अर्ध – सदी गतिशील रही , जिनकी निर्मल कर्म – कथा संकेतक संगे मील रही । जिनकी निर्मल छत्र  छाँव पा  सिकन्दरपुर छविमान हुआ , जिनकी समता सम्मति से यह पतारा क्षेत्र महान हुआ । जो नव नायक रहे सतघरा कुल के , और समर के कष्ट सहे , जो अपने गाँव सिकन्दरपुर के समाज सुधारक व्यक्ति रहे । जो वर्षों रहे अध्यापक और जिला पंचायत सदस्य रहे , दलीय उपेक्षा और क्षेत्र में भीकम अंक अद्वितीय रहे । दिये अनेकों जल – नल , घर , जिनके कर कमलों ने , जिनके कार्यकाल में पायीं बंदूकें निबलों विकलों ने। जिनकी कृपा कोर से दुर्लभ कवि सम्मेलन सुलभ हुये , जिनके माध्यम से अगणित आमत्य हमारे अतिथि ...

भूले गीत बिसरि गयी कविता

भूले गीत बिसरि गयी कविता  और लेखनी अचल हुयी है। भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है। कल , कोमल कल्पना लोक में आकस्मिक भूचाल आ गया , भावों के गंभीर सिंधु में  असमय भीषण ज्वार आ गया। और किसी की आँख झील सी हँसते – हँसते सजल हुयी है ।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। है स्वीकार मुझे , मैंने ही फणि – मणि साथ निभाना चाहा , अवगुण के कीचड़ में मानवता- का कमल खिलाना चाहा । कलयुग में सतयुग लाने की त्रुटि से पहली पहल हुयी है।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। मानव का अतीत जीवन भर ही , उसका पीछा करता है , कभी किसी अनजान मोड पर बाहों में भींचा करता है। इसी श्रंखला में , अमृत सी साख , किसी की गरल हुयी है। भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। सुमन मिले थे कुछ मनमौजी जो काँटों की चुभन दे गये , आल्हादित और मध्य चन्द्र को चिर स्थायी ग्रहण दे गये। एक सुहानी गुन – गुन करती उजियाली निशि तरल हुयी है।  भूले गीत बिसरि गयी कविता और लेखनी अचल हुयी है।। अच्छा चलो क्षमा कर भी दो भूल , अज्ञ आवारापन की , या सात्विक श्...

बहुत रो चुके अब मत रोओ।

           बहुत रो चुके अब मत रोओ।                                       बहुत रो चुके अब मत रोओ।                                रोने से आँसू बहते हैं ,                                मन के दुख जग से कहते हैं ,                                जग सुन ले ,                                सुन कर इठलाये ,                ...