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माँ हिन्दी कविता Maa Hindi Poem

माँ                    माँ                    दिल के टुकड़े करने वाला , दिल का टुकड़ा लगता है , नालायक बेटा भी माँ को , राजा बेटा लगता  है। माँ की ममता जैसा निर्मल , कोई दर्पण क्या होगा , जिसको धूल सना बच्चा भी , सूरज चंदा लगता है। पूछो तो नन्हें पछी से , जब धमकता है मौसम ,  माँ के पंखों मे छिप जाना , कितना अच्छा लगता है। जिसके चरणों में ज्ञानीजन , तीनों लोक बताते  हैं , मुझको माँ के चरणों में , जग सिमटा-सिमटा लगता है। चुंबन अंकित करती है जब , सिर पर हांथ फिरा कर माँ , अम्बर से ऊँचा मुझको , तब अपना माथा लगता है। गंगा जल की पावनता की , माना महिमा भारी  है , लेकिन “माँ” के आँसू से , वो मुझको हल्का लगता है। दुख से राहत पाने को , यूँ  तो लाखों रस्ते हैं , माँ की यादों में खो जाना , सीधा रस्ता लगता  है।   माँ की गोद अगर मिल जाये , सारी दुनियाँ देकर भी , महँगे युग से भी मुझको , यह सस्ता सौदा लगता है। दिल के टुकड़े करने वाला , दिल का टुकड़ा लगता ह...

मैं तो था लाचार, प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया main to tha laachaar, pyaar ne tumako kyon majaboor kar diya बलबीर सिंह रंग

 "मैं" तो था लाचार “मैं” तो था लाचार , प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया ? देखा   चारो   ओर   तुम्हारे वरदानों  की  भीड़  खड़ी है , अभिशापित सुहाग की बिंदी विधि  ने  मेरे  भाल  जड़ी है। पाप किया या पुण्य कमाया इसका निर्णय कौन  करेगा , क्योंकि यहाँ की हर परिभाषा लाखों बार  बनी  बिगड़ी है। पाप पुण्य के सिरजन हारो मेरा  दुर्लभ   दान   निहारो , खाली हांथों रहकर जो कुछ जिसे दिया भरपूर कर दिया। “मैं” तो था लाचार , प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया ? दो दिन खेल गँवाया बचपन रातों   में   काटी   तरुणायी , लिखी आंसुओं  ने  जो पाती वह मुसकानों तक पहुंचायी। मैं   दुर्बलताओं    का  बंदी पर   मेरी  हिम्मत  तो देखो , गीतों का परिधान पहन कर सूली  ऊपर  सेज  सजायी। लोक  लाज  के  पहरे दारो आओ  अपनी  भूल सुधारो , इतना ...

किसी अजाने गाँव में आओ हम तुम हो आयें हिन्दी कविता Hindi poems

आओ हम तुम हो आयें  दूर नगर के कोलाहल से   किसी   अजाने   गाँव   में   सुख सपनों की छांव में आओ हम तुम हो आयें।                                जहां सदा उन्मुक्त विहग दल                              भोर   उगाता   है   गा - गा कर                              कली- कली   के द्वारे   मधुकर                              प्यार   जताता   है   जा-जा कर। जहां तरुणियो...

आँखें मेरी नम रहतीं हैं

     आँखें मेरी नम रहतीं हैं    हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं   हैं अपने पास बुलाने को तेरा   रस्ता   तकती रहतीं हैं बस कुछ ही दिन हुये अभी हैं हमको साथ में चलते – चलते सफर   बहुत   लंबा   है   साथी दूर न जाना मुझसे झगड़ के रूठ के मुझसे खफा न होना , ये सांसें तुमसे चलती हैं हे   स्नेहा तुमसे   विछुड़   कर आँखें   मेरी नम रहतीं   हैं मेरी आदत है कुछ ऐसी जो तुमको दुख पहुँचाती है और विवश होकर फिर तुम मुझको दस-बीस सुनाती हो हे प्रिया तुम्हारे वचनों को सुन , दिल की धड़कन रुक-रुक चलती है हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं   हैं मेरे जीवन की साथी होकर क्या तुम मुझको समझ न पायी चीर के देखो सीना मेरा उसमे हो बस तुम्ही समायी सुबह- शाम ले नाम तुम्हारा , मेरी दिनचर्या चलती है हे स्नेहा तुमसे विछुड़ कर आँखें मेरी नम रहतीं   हैं कभी-कभी तो प्यार ही मेरा क्रोध का कारण बनता है पर सदियों से पति-पत्नी में अन-मन यूं चलता रहता है भले रात हो म...