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हम आपके बिन

हम आपके बिन 

राका पति से रहित रात्रि के सूनेपन से पीड़ित हो,
करने लगा कल्पना कल की सजल नयन उन्मीलित हो।

अब नहीं रहे हैं सिकन्दरपुर में परमवीर श्री रामवीर,
सद्ज्ञानों के ज्ञान पुंज के नहीं विकल्प बचे है और।

अब यह तपो भूमि कुछ इस रजनी जैसी होगी,
मनु की मानवता पति वंचित सजनी जैसी होगी।

एक हूक सी दिल में उठी और कागज पर कलम लगी चलने,
उन आशुतोष आराध्य देव की लगी प्रभाती सी पढ़ने।

जिनकी सृजन साधना से यह अर्ध – सदी गतिशील रही,
जिनकी निर्मल कर्म – कथा संकेतक संगे मील रही ।

जिनकी निर्मल छत्र छाँव पा सिकन्दरपुर छविमान हुआ,
जिनकी समता सम्मति से यह पतारा क्षेत्र महान हुआ ।

जो नव नायक रहे सतघरा कुल के, और समर के कष्ट सहे,
जो अपने गाँव सिकन्दरपुर के समाज सुधारक व्यक्ति रहे ।

जो वर्षों रहे अध्यापक और जिला पंचायत सदस्य रहे ,
दलीय उपेक्षा और क्षेत्र में भीकम अंक अद्वितीय रहे ।

दिये अनेकों जल – नल, घर, जिनके कर कमलों ने,
जिनके कार्यकाल में पायीं बंदूकें निबलों विकलों ने।

जिनकी कृपा कोर से दुर्लभ कवि सम्मेलन सुलभ हुये,
जिनके माध्यम से अगणित आमत्य हमारे अतिथि हुये।

जिनमें था उत्साह किसी भी तरुण व्यक्ति से अधिक अभी,
चिर तारुण्य साधना जिनकी नही हुयी थी थकित अभी।

मर्यादित परिहास कथन फिर सियाराम पल-पल कहना,
थी जिनकी दिनचर्या दैहिक, दैविक दुख हँस - हँस सहना।

मेरे जैसा लघु प्राणी जिनके संस्मरण  सुनकर,
पाता था विजयानुभूति प्रारब्धों के कटु कृंदन पर।

जिनकी छणिक निकटता  दीर्घ निशान्तम को हरती थी,
सरल सादगी लंकेशों में कौशलेश सी लगती थी।  

शिवम रहित सत्यम, सुन्दरम तो विकलांगम बन जायेंगे,
अब हम जैसे आवारा प्राणी, कहाँ सहारा पायेंगे।

कौन सुनायेगा अब नज़्मे, शेरे , कवितायें पावन,
कौन सिखायेगा गीता के कर्मयोग का अनुपालन।

मात्र सिकन्दरपुर ही क्या अब तो क्षेत्र पतारा सूना होगा,
भाई मेरे अब ध्यान रखो , मिल – जुल कर रहना होगा।

मत बनो कोई अब दुर्योधन मत आपस मेँ टकरार करो,
अब कलयुगी धृतराष्ट्रों से बचने के स्वयं प्रयास करो ।

क्योंकि श्री रामवीर सिंह अब नहीं करेंगे उद्दबोधन ,
भाई मेरे यह कलयुग है कुछ करो स्वयं ही संशोधन।

तुम सबका ही नहीं हमारा भी गौरव बड़ जाएगा,
उस नीलकंठ वरदानी का भी सपना सच हो जायेगा।।


प्रशान्त चौहान 
(10-12-2010)

sahitya sanklan hindi poem

 

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