अब क्यों कलम चला करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? पहले भी एकबार चली थी , तब की त्रुटि सुकुमार भली थी। उन-त्रुटि कन्याओं की अब क्यों- कायाकल्प किया करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? बासन्ती परिचय था जग से , बसुधा प्रथम मिली थी नभ से। क्षितिज-मरीचिकाओं में अब क्यों- व्यर्थ उढ़ान भरा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? त्रेता में सब कुछ संभव था , अवतारों का अद्द्भुत युग था। लंकेशों में कौशलेश अब- क्यों भूमिजा जपा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? तब हमने देखे थे सपने , सपने में अनगिन थे अपने। इन टूटे सपनों में अब क्यों- खण्डित जगत रचा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? जग अपने द्वंदों में डूबा , कविताओं गीतों से ऊबा। इन ऊबी पीड़ाओं को अब- क्यों वेदना दिया करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? माना जगत मात्र सपना है , क्यों कोई लगता अपना है ? इन सपनों के अपनों को अब- क्यों मन-मीत कहा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? अब तक जो हमसफर मिले हैं , छोड़ मोड पर गये चले हैं। फिर निति नए बटोही अब क्यों- पथ में साथ लिया लिया करती है ? अब क्यों...
हिन्दी कवितायें, रचनाएँ , जीवन परिचय, मुंशीप्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त