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अब क्यों कलम चला करती है?

अब क्यों कलम चला करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? पहले भी एकबार चली थी , तब की त्रुटि सुकुमार भली थी। उन-त्रुटि कन्याओं की अब क्यों-  कायाकल्प किया करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? बासन्ती परिचय था जग से , बसुधा प्रथम मिली थी नभ से। क्षितिज-मरीचिकाओं में अब क्यों- व्यर्थ उढ़ान भरा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? त्रेता में सब कुछ संभव था , अवतारों का अद्द्भुत युग था। लंकेशों में कौशलेश अब- क्यों भूमिजा जपा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? तब हमने देखे थे सपने , सपने में अनगिन  थे अपने। इन टूटे सपनों में अब क्यों- खण्डित जगत रचा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? जग अपने द्वंदों में डूबा , कविताओं गीतों से ऊबा। इन ऊबी पीड़ाओं को अब- क्यों वेदना दिया करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? माना जगत मात्र सपना है , क्यों कोई लगता अपना है ? इन सपनों के अपनों को अब- क्यों मन-मीत कहा करती है ? अब क्यों कलम चला करती है ? अब तक जो हमसफर मिले हैं , छोड़ मोड पर गये चले  हैं। फिर निति नए बटोही अब क्यों- पथ में साथ लिया लिया करती है ? अब क्यों...

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी

क्षमा करो साथी अब ऐसी, फिर न कभी रुसवाई होगी  क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी। नींद स्वयं ही चुरा ले गयी , मेरे मन के स्वप्न सुहाने , अंधियारी रजनी के धोखे , भूल हो गयी यह अनजाने। जीवन के चौराहे पर कुछ – मीत मिले थे बिन पहिचाने , यौवन के आवारापन में , भूल हो गयी यह अनजाने ।    उनमें से ही कुछ ने आकर , पीर तुम्हें पहुंचाई होगी , जितनी निकट तुम्हारे , उतनी और कहाँ निठुराई होगी। क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी।। मिलन–विरह के कोलाहल में , तुम अब तक एकाकी कैसे ? इस परिवर्तनशील जगत में , तुम सचमुच जैसे के तैसे। कितनी बार क्षमा मांगी और , कितना प्राण–प्रताण किया है , फिर भी शायद तुमने हमको , नहीं अभी तक क्षमा किया है। ऐसी निष्ठुर नीति धरा पर , कब किसने अपनायी होगी , और “आराधना” न इस धरा पर , भक्तों ने अपनायी होगी। क्षमा करो साथी अब ऐसी , फिर न कभी रुसवाई होगी।। यौवन की कुलषित कारा में , तुम पावन से भी अति पावन , पापी दुनियाँ बहुत बुरी है , ओ मेरे भोले मन भावन। मेरी पर्णकुटी में आकर तुमने , मुझको कृतार...

बीते वर्ष बताते जाओ मन की बातें जाते - जाते Beete varsh batate jao man ki baaten jate - jate

बीते बर्ष ! बताते जाओ, मन की बातें जाते - जाते।  बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। कितने मधुर लगे बचपन में ? क्या सपने देखे यौवन में ? पंख थके तब कैसा अनुभव - हुआ सिथिलता आते-आते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। सुमन मुलायम कितने पाये ? तन कितने कल्याण छिपाए ? राव रंक को शांति मिली क्या- नारायण गुण गाते-गाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। जाति-धर्म या वर्ग-भेद की , “हल्ला-बोल” कुरान - वेद की , कैसी लगीं ये परिभाषायें- तुम्हें यहाँ से जाते – जाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। तेरह दिन की अटल कहानी , देव-इंद्र की संयुक्त वानी , सीता राम रिझा पायी क्या- माया काशी जाते – जाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। कितना सुख भोगा जीवन में ? है कैसी चिंता चितवन में ? कितने अपने निकट रहे , और- कितने खोये पाते – पाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जाते- जाते। आया कौन बिना आमंत्रण ? किसने ठुकरा दिया निमंत्रण ? कौन समय पर मुकर गया है- झूठी कसमें खाते – खाते ? बीते वर्ष ! बताते जाओ , मन की बातें जा...

अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का Hindi Poem Achha chalo prayas karenge apne me seemit rahne ka

अच्छा चलो प्रयास करेंगे  अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। धरती भी तो अपनी कीली पर जाने कब से घूम रही है , और न जाने कब से अपने सूर्य देव पर रीझ रही है। अब हम भी अभ्यास करेंगे , अविरल ऐसी गति सहने का , अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। अम्बर भी अपनी ऊंचाई- पर ही सदा तना रहता है , और वहीं से चाँद- सितारों- का उगना-छुपना रहता है। अब हम भी एहसास करेंगे , नभ जैसे उन्नत रहने का , अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। सागर भी अपनी गहराई- में ही मिलन गीत गाता है , और इसी गंभीर प्रकृति से शृष्टि-प्रलय भी सह जाता है। हम अद्भुत आभास करेंगे , शोक-सिंधु संचित करने का , अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। मेरे अभिमानी अग्रज तुम- कैसे निष्ठुर हो जाते हो ? ज्ञान-भक्ति के संवादों से अहंकार में खो जाते हो। आओ बुद्धि- विकास करेंगे , क्रोध-समय संयत रहने का , अच्छा चलो प्रयास करेंगे अपने में सीमित रहने का। शीत लहर सी याद तुम्हारी तन , मन तक सिहरा जाती है , मुस्कानों के महानगर से  गम का गाँव कंपा जाती है। पर हम व्रत- उपवास ...

माँ हिन्दी कविता Maa Hindi Poem

माँ                    माँ                    दिल के टुकड़े करने वाला , दिल का टुकड़ा लगता है , नालायक बेटा भी माँ को , राजा बेटा लगता  है। माँ की ममता जैसा निर्मल , कोई दर्पण क्या होगा , जिसको धूल सना बच्चा भी , सूरज चंदा लगता है। पूछो तो नन्हें पछी से , जब धमकता है मौसम ,  माँ के पंखों मे छिप जाना , कितना अच्छा लगता है। जिसके चरणों में ज्ञानीजन , तीनों लोक बताते  हैं , मुझको माँ के चरणों में , जग सिमटा-सिमटा लगता है। चुंबन अंकित करती है जब , सिर पर हांथ फिरा कर माँ , अम्बर से ऊँचा मुझको , तब अपना माथा लगता है। गंगा जल की पावनता की , माना महिमा भारी  है , लेकिन “माँ” के आँसू से , वो मुझको हल्का लगता है। दुख से राहत पाने को , यूँ  तो लाखों रस्ते हैं , माँ की यादों में खो जाना , सीधा रस्ता लगता  है।   माँ की गोद अगर मिल जाये , सारी दुनियाँ देकर भी , महँगे युग से भी मुझको , यह सस्ता सौदा लगता है। दिल के टुकड़े करने वाला , दिल का टुकड़ा लगता ह...

मैं तो था लाचार, प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया main to tha laachaar, pyaar ne tumako kyon majaboor kar diya बलबीर सिंह रंग

 "मैं" तो था लाचार “मैं” तो था लाचार , प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया ? देखा   चारो   ओर   तुम्हारे वरदानों  की  भीड़  खड़ी है , अभिशापित सुहाग की बिंदी विधि  ने  मेरे  भाल  जड़ी है। पाप किया या पुण्य कमाया इसका निर्णय कौन  करेगा , क्योंकि यहाँ की हर परिभाषा लाखों बार  बनी  बिगड़ी है। पाप पुण्य के सिरजन हारो मेरा  दुर्लभ   दान   निहारो , खाली हांथों रहकर जो कुछ जिसे दिया भरपूर कर दिया। “मैं” तो था लाचार , प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया ? दो दिन खेल गँवाया बचपन रातों   में   काटी   तरुणायी , लिखी आंसुओं  ने  जो पाती वह मुसकानों तक पहुंचायी। मैं   दुर्बलताओं    का  बंदी पर   मेरी  हिम्मत  तो देखो , गीतों का परिधान पहन कर सूली  ऊपर  सेज  सजायी। लोक  लाज  के  पहरे दारो आओ  अपनी  भूल सुधारो , इतना ...

किसी अजाने गाँव में आओ हम तुम हो आयें हिन्दी कविता Hindi poems

आओ हम तुम हो आयें  दूर नगर के कोलाहल से   किसी   अजाने   गाँव   में   सुख सपनों की छांव में आओ हम तुम हो आयें।                                जहां सदा उन्मुक्त विहग दल                              भोर   उगाता   है   गा - गा कर                              कली- कली   के द्वारे   मधुकर                              प्यार   जताता   है   जा-जा कर। जहां तरुणियो...